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शुद्ध जैतून के तेल और प्राकृतिक सेब के सिरके दोनों में कलौंजी का सत्त रक्त में शर्करा की मात्रा कम करने में प्रभावशाली होता है।

शुद्ध जैतून के तेल और प्राकृतिक सेब के सिरके दोनों में कलौंजी का सत्त रक्त में शर्करा की मात्रा कम करने में प्रभावशाली होता है।


शुद्ध जैतून के तेल और प्राकृतिक सेब के सिरके दोनों में कलौंजी का सत्त रक्त में शर्करा की मात्रा कम करने में प्रभावशाली होता है।

अल्लाह के पैगम्बर ने कहा था "कलौंजी में हर मर्ज़ की दवा है।" तो मधुमेह के मामले में कलौंजी कैसे लाभकारी भूमिका निभाता है? व्रत के बाद और खाने के तुरंत बाद कलौंजी का सेवन करने पर क्या यह रक्त में शर्करा का स्तर समायोजित करता है? क्या इसमें शरीर के अंगों को मधुमेह की कठिनाइयों से दूर रखने की भी क्षमता होती है?   

यदि आपको हाल में मधुमेह हुआ है या कई वर्षों से था? और यदि आपको अपनी दवाओं और औषधियों से अपनी बीमारी का उपचार करने के लिए कोई कारगर दवा नहीं मिली है तो हम आपको जैतून के तेल में कलौंजी का तैलीय सत्त और प्राकृतिक सेब के सिरके में कलौंजी का जलीय सत्त प्रयोग करने की सलाह देते हैं। इस बीज में मधुमेह सहित प्रत्येक बीमारी का उपचार मौजूद है।  

दिसंबर 2003 में प्रयोगात्मक चिकित्सा की तोहोकु पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने पचास चूहों पर अध्ययन किया, जहाँ चूहों में स्ट्रेप्टोज़ोटोसिन का इंजेक्शन लगाकर उनमें उच्च रक्तचाप उत्पन्न किया गया, जो अग्न्याशय में बीटा कोशिकाओं के लिए एक रासायनिक विषाक्त पदार्थ है, इसे प्रयोगशाला के पशुओं में शर्करा का स्तर बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक शोध में भी प्रयोग किया जाता है। इसके बाद, चूहों को दो समूहों में विभाजित किया गया: चूहों के पहले समूह को तीस दिनों तक प्रतिदिन कलौंजी का सत्त दिया गया। दूसरे समूह को कलौंजी के सत्त के बिना नमक का घोल दिया गया। अध्ययन में पता चला कि मधुमेह से ग्रस्त चूहों को कलौंजी का सत्त देने पर उनके रक्त शर्करा के स्तर में काफी कमी आयी। इसके अलावा, यह सिद्ध किया गया कि इससे उन चूहों के रक्त में इंसुलिन का स्त्राव भी बढ़ा जिन्हें कलौंजी का सत्त दिया गया था। इसका कारण यह है कि कलौंजी का सत्त बीटा कोशिका (अग्नाशय में) के प्रसार की दर बढ़ा देता है जो इंसुलिन के स्त्राव के लिए जिम्मेदार होता है। दूसरे परिणाम को अद्भुत माना गया है, विशेष रूप से अग्नाशय की खराबी के सबसे मूलभूत क्रियाविधियों में से एक है इसके ऊतकों का विघटन होना और इसके द्रव्यमान का क्षय होना। इसलिए, कलौंजी के सत्त का प्रभाव ना केवल चूहों में शर्करा का स्तर, और इंसुलिन का स्त्राव बढ़ाने तक सीमित होता है, बल्कि यह मधुमेह के मरीजों में सबसे महत्वपूर्ण जटिलताओं का सामना करने में भी योगदान करता है, जैसे समय के साथ अग्नाशय की संरचना का क्षय होना। (Kanter et.al., 2003)  चूँकि, हम सहक्रिया के तथ्य की वजह से अपनी संतुलित पौष्टिकता प्रणाली में भरोसा करते हैं, अर्थात, एकल-पदार्थ उपचार पर्याप्त नहीं होता है, जिसे पवित्र कुरान में पाया जा सकता है, जहाँ खाद्य और पेय पदार्थों से संबंधित सभी पाठ और आयतों को बहुवचन और सहक्रिया के रूप में उल्लेखित किया गया है। हमारे जीर्ण रोगों की क्रियाविधि विविध होती है, इसलिए बीमारियों के तंत्रों पर वार करने वाले संयोजक, आहार और क्रियाविधियां भी अलग-अलग होने चाहिए। इसलिए, हम देखते हैं कि पवित्र कुरान अलग-अलग आहारों के बारे में नहीं बताता, बल्कि उन्हें एक समूह के रूप में बताता है, और यह चिकित्सीय सहकारिता के सिद्धांत के अनुकूल है। तो, हमें औषधीय सत्त को जैतून के तेल और सेब के सिरके दोनों में क्यों मिलाना चाहिए? कुरान के कौन से रहस्य इसका कारण हैं? 

कुरान के सहकारिता के सिद्धांत के प्रयोग से प्राप्त विशेषज्ञता और अनुभवों के आधार पर, हम आपको शुद्ध जैतून के तेल में कलौंजी के तेल का सत्त प्रयोग करने की सलाह देते हैं, क्योंकि कलौंजी के लिए संरक्षक के रूप में कार्य करने वाले प्राकृतिक शुद्ध जैतून के तेल में रक्त के शर्करा का स्तर कम करने की क्षमता होती है। जैसा कि हम जानते हैं, ग्लूकोस का स्तर सामान्य सीमाओं से जितना ज्यादा करीब होता है, मधुमेह होने का खतरा भी उतना ही कम होता है, और दृष्टिपटल, गुर्दे, रक्त वाहिकाएं, नसें और प्रतिरक्षा प्रणाली भी कम प्रभावित होती है।2011 में खाद्य जैवरसायन की पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में दर्शाया गया कि जैतून के तेल में फेनोलिक यौगिक शामिल होता है, जिसे हाइड्रॉक्सिल समूह से जुड़े छह-कार्बन अणुओं के घेरे की संरचना के रूप में जाना जाता है, जो दो विशेष पाचक एंजाइम में बाधा उत्पन्न करता है जो कार्बोहाइड्रेट पचाते हैं और उन्हें अलग करते हैं,  जिनके नाम हैं: α-ग्लूकोसाइडेस और α-एमिलेज। ये दोनों एंजाइम पाचन नली में कार्बोहाइड्रेट के पाचन और जलीय विश्लेषण के लिए जिम्मेदार होते हैं। इनमें बाधा उत्पन्न होने पर, बड़े शर्करा मोनोसैकराइड में परिवर्तित नहीं होंगे। यह बताना जरुरी है आंत खाद्य पदार्थों से कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन या किसी भी प्रकार के वसा के यौगिकों को तब तक अवशोषित नहीं कर सकता है, जब तक कि उन्हें उनकी मौलिक संरचना में परिवर्तित नहीं किया जाता है, और इसके लिए α-ग्लूकोसाइडेस और α-एमिलेज सहित सभी एंजाइम का सक्रिय होना आवश्यक होता है। इसलिए, शर्करा के अपूर्ण पाचन की वजह से जैतून का तेल पाचन तंत्र में भोजन से उत्पन्न शर्करा की मात्रा को कम करता है। इस प्रकार, अवशोषित शर्करा कम करके जैतून का तेल रक्त में ग्लूकोस के अणुओं में कमी करता है। इसके अलावा, जैतून का तेल अपने शर्करा का स्तर कम करके एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यह इंसुलिन का स्त्राव बढ़ाने के माध्यम से नहीं किया जाता है, बल्कि इंसुलिन के लिए इंसुलिन संग्राहक की संवेदनशीलता को बढ़ाकर किया जाता है। बहुत सारे लोग जो धड़ क्षेत्र में त्वचा के नीचे जमा चर्बी की वजह से मोटापे से ग्रस्त होते हैं, इसका कारण उनके धड़ क्षेत्र में मौजूद ट्राइग्लिसराइड होता है, जिसकी वजह से कमर से कूल्हे का घेरा बढ़ा जाता है जो इंसुलिन संग्राहक के लिए इंसुलिन की संवेदनशील से जुड़ा हुआ है। इंसुलिन (चाबी) मौजूद होता है लेकिन यह चाबी ताला (इंसुलिन संग्राहक) खोलने में सक्षम नहीं होती है। इसकी वजह से ताला खोलने में चाबी की अपर्याप्त क्षमता होती है।  (Loizzo et.al., 2011)और हम यहाँ एक बार फिर से सहकारिता के सिद्धांत पर जोर देते हैं, जो कई प्राकृतिक आहारों को एक साथ संयुक्त करता है जिनमें से प्रत्येक विभिन्न क्रियाविधियों में काम करता है। ताकि हम बीमारी नियंत्रित कर सकें, जिसे हम सामान्य चिकित्सा में नहीं कर सकते हैं क्योंकि एक से अधिक दवाओं को आपस में मिलाने पर वे दुष्प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार, कलौंजी का सत्त अग्नाशय के द्रव्यमान में वृद्धि करता है, और स्त्रावित इंसुलिन की मात्रा में वृद्धि करता है। इसके अलावा, सत्त का संरक्षक, जैतून का तेल, इंसुलिन के लिए इंसुलिन संग्राहक की संवेदनशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिणामस्वरूप, आंत के माध्यम से अवशोषित शर्करा की मात्रा कम करने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। चूँकि, मधुमेह की समस्या उत्पन्न करने वाली कई अन्य गतिविधियां हैं, इसलिए हम आपको उन सभी गतिविधियों पर हमला करके मधुमेह समाप्त करने के लिए जैतून के तेल और सिरके के साथ कई प्रकार के औषधीय सत्तों का प्रयोग करने की सलाह देते हैं।

कई सारी औषधियों और मिश्रणों को सूखा प्रयोग करने पर वे ज्यादा लाभकारी क्यों नहीं होती हैं और हमें सत्त का पूरा लाभ कैसे मिलता है यह जानने के लिए, इन लिंक्स पर क्लिक करें      

और अधिक लाभ के लिए हम आपको कलौंजी के जलीय सत्त का संरक्षक सेब का सिरका प्रयोग करने की सलाह देते हैं। क्योंकि यह रक्त में शर्करा का स्तर कम करता है। 1984 में किये गए एक अध्ययन में दर्शाया गया कि रक्त में शर्करा के स्तर के लिए प्राकृतिक सेब के सिरके का हाइपोकोलेस्टरोलेमिक प्रभाव इसमें मौजूद पेक्टिन की वजह से होता है, जो सेब के सिरके में पाया जाने वाला पानी में घुलनशील फाइबर होता है, और यह एक प्रकार का पॉलीसैकराइड होता है जो सेब के कोशिकीय दीवार की संरचना में पाया जाता है।ऐसा पाया गया है कि सेब के सिरके में मौजूद पेक्टिन के सेवन से आंत्रीय आवरण की स्थैतिक जलीय परत की मोटाई में वृद्धि होती है। इसके परिणामस्वरूप नमक और ग्लूकोस के लिए आंत की अवशोषण दर धीमी हो जाती है। यह एक अध्ययन के माध्यम से पता चलता है जो यह पुष्टि करती है कि पेक्टिन देने पर अवशोषण की दर 3.4 मिनट से 5.7 मिनट तक बढ़ जाती है। (Blanco-Gomis et.al., 1998)  

इस तरीके से पेक्टिन स्थैतिक जलीय परत की मोटाई बढ़ाकर आंत में ग्लूकोस का अवशोषण कम करता है। इससे रक्त में ग्लूकोस बहुत धीमी गति से प्रवाहित होता है। जिससे रक्त शर्करा के स्तर में अनियमितता और शर्करा के स्तरों में होने वाला आकस्मिक परिवर्तन बाधित होता है। इस प्रकार, हम कलौंजी के जलीय सत्त और प्राकृतिक सेब के सिरके के बीच चिकित्सीय सहकारिता और सहयोग का सिद्धांत देखते हैं जो विभिन्न प्रकार के फाइबर शामिल करता है, जो मधुमेह की समस्याओं को दूर करते हैं। (Flourie et.al., 1984)       

कोशिकाएं प्रतिदिन कैसे नष्ट होती हैं? कितनी कोशिकाएं मरती हैं? ये कोशिकाएं कहाँ जाती हैं? संतुलित पौष्टिकता प्रणाली की क्या भूमिका है और यह रोगग्रस्त कोशिकाओं को स्वस्थ कोशिकाओं से कैसे बदलता है? यह नया खोजा गया सिद्धांत है। 


जमिल अल क़ुद्सी

एमडी-एमएससी सीएएम-डुप एफएम


Blanco-Gomis, D., Herrero-Sánchez, I. & Alonso, J. M. 1998. Characterisation of apple cider cultivars by chemometric techniques using data from high-performance liquid chromatography and flow-injection analysis. Analyst, 123, 1187-1191.


Flourie, B., Vidon, N., Florent, C. & Bernier, J. 1984. Effect of pectin on jejunal glucose absorption and unstirred layer thickness in normal man. Gut, 25, 936-941.


Kanter, M., Meral, I., Yener, Z., Ozbek, H. & Demir, H. 2003. Partial regeneration/proliferation of the β-cells in the islets of langerhans by nigella sativa l. In streptozotocin-induced diabetic rats. The Tohoku journal of experimental medicine, 201, 213-219.


Loizzo, M., Lecce, G., Boselli, E., Menichini, F. & Frega, N. 2011. Inhibitory activity of phenolic compounds from extra virgin olive oils on the enzymes involved in diabetes, obesity and hypertension. Journal of Food Biochemistry, 35, 381-399.




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