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जैतून के तेल और सेब के सिरके दोनों में सौंफ का सत्त अल्सर और जठरशोथ का उपचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

जैतून के तेल और सेब के सिरके दोनों में सौंफ का सत्त अल्सर और जठरशोथ का उपचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है


क्या आप जठरशोथ से पीड़ित हैं? क्या आपको खाने के बाद या भूख लगने पर बहुत अधिक दर्द का अनुभव होता है जो नींद में भी आपको कष्ट देता है? क्या अल्सर की वजह से आप उठ जाते हैं और आपको अपनी दैनिक गतिविधि करने में कठिनाई होती है? इन लक्षणों से छुटकारा पाने के लिए हम आपको शुद्ध जैतून के तेल और सेब के सिरके दोनों में सौंफ का सत्त प्रदान करते हैं।

पेट जठरांत्रिय मार्ग (पाचन प्रणाली) के सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है, यह उदर के ऊपर बाएं कोने पर और सीने या पसली के ठीक नीचे स्थित होता है। यह जठरांत्रिय मार्ग का मांसपेशीय खोखला हिस्सा होता है। यह ग्रासनली और छोटी आंत के बीच जुड़ा होता है। भोजन के पाचन में सहायता करने के लिए यह पाचक एंजाइम और आमाशय अम्ल उत्पन्न करता है। यह पचे हुए भोजन को आंशिक रूप से ग्रहणी और आंतों में भेजता है। आमाशय के रस में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के कारण, यह ऐसे किसी भी सूक्ष्म जीव को बाहर निकाल देता है जो भोजन के साथ पेट में चले जाते हैं। इसे हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के द्वारा प्राप्त किया जाता है, जो कीटाणु को मारता या रोकता है और प्रोटीज को काम करने के लिए दो का pH प्रदान करता है। पेट हाइड्रोलाइज़ प्रोटीनों को पचाने का काम करता है, जबकि आंत वसा और कार्बोहाइड्रेट पचाते हैं।  (Kong et.al., 2008)    

पेट की संरचना इसकी परतों और कोशिकाओं में और इसकी आकृति और स्थिति में भी विशेष है। इस तथ्य के बावजूद की हाइड्रोक्लोरिक अम्ल त्वचा के लिए संक्षारक होता है और त्वचा की परतों को नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन मुख्य रूप से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल शामिल करने वाला आमाशय का रस पेट की आंतरिक परतों को नुकसान या क्षति नहीं पहुँचा सकता है।   

यह प्रोस्टाग्लैंडीन के कारण होता है जिसे अल्लाह ने आमाशय श्लेष्मा और आमाशय के रस में उच्च सांद्रता में स्रावित होने के लिए निर्मित किया है। इससे पेट को प्रोटीन की संरचनाओं को क्षति पहुँचाये बिना प्रोटीन पचाने की क्षमता प्राप्त होती है जो पेट की श्लेम दीवार निर्मित करता है। इस प्रकार, परत में संरक्षक श्लैष्मिक परतें और संरक्षक प्रोस्टाग्लैंडीन परत, जो पेट की परत को ढंकता है, पेट को अपना कार्य करने के लिए सुरक्षित बनाते हैं। "यह अल्लाह की रचना है। तो मुझे दिखाओ कि उनके अलावा दूसरों ने क्या बनाया है। इसके बजाय, गलत काम करने वाले बिल्कुल गलत होते हैं। (लुक़मान 11)”

आमाशय के रस की उत्पत्ति दो कारकों में से एक की वजह से हो सकती है। पहला कारक है पेट की पाचन क्षमता में वृद्धि, क्योंकि अम्लों और रसों की सांद्रता बढ़ जाती है। संतुलित पोषण प्रणाली के माध्यम से हम देख सकते हैं कि यह रक्त में अम्ल की बढ़ी हुई मात्रा की वजह से हो सकता है, जहाँ पेट रक्त से उन्हें अवशोषित करके अम्ल का उत्पादन करता है। इसके अनुसार, रक्त में अम्लता जितनी ज्यादा होती है, आमाशय के रस में अम्लों की सांद्रता भी उतनी ही ज्यादा होती है। इस प्रकार, ग्रहणी का अल्सर हो सकता है जिसे पेट में अम्लों की बढ़ी हुई सांद्रता से जोड़ा जाता है। 

अल्सर होने के कई कारण हैं। सबसे महत्वपूर्ण कारण है हेलिकोबैक्टर पाइलोरी कीटाणु से होने वाला संक्रमण, जो पेट और छोटी आंत की श्लेष्मा परतों को कमजोर बना देता है। ज्यादातर मरीजों में, पेट की श्लेष्मा परत में इन कीटाणुओं की मौजूदगी और पुनरुत्पत्ति पेट या ग्रहणी में होने वाले अल्सर का आधारभूत कारण है। साथ ही साथ यह जठरशोध और यहाँ तक कि पेट का कैंसर होने का भी मुख्य कारण है, क्योंकि एच. पाइलोरी विशेष एंजाइम स्त्रावित करके पेट के अम्लों में मिल सकता है जो इसे अम्ल से बचाते हैं। (Van Zanten et.al., 1994)  

इसके अलावा, इस कीटाणु को क्षोभी आंत्र विकार से भी जोड़ा जाता है।  

दर्द और गठिया से राहत पाने के लिए एस्पिरिन, आइबूप्रोफेन और डिक्लोफेनाक जैसे प्रोस्टाग्लैंडीन-रोधी का अत्यधिक प्रयोग पेट की श्लेष्मा झिल्ली को कमजोर बनाने और क्षतिग्रस्त करने का मुख्य कारण है। (Griffin et.al., 1991)   

जॉलिंगर-एलिसन सिंड्रोम आमाशय अल्सर उत्पन्न करने का मुख्य कारण है। इस सिंड्रोम में गैस्ट्रीक हॉर्मोन का उत्पादन बढ़ जाता है। यह हॉर्मोन पेट में स्थित जी कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित किया जाता है, और यह पेट या ग्रहणी में पार्श्विका कोशिकाओं को उत्तेजित करता है जिससे हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का उत्पादन बढ़ जाता है, जिसकी वजह से गैस्ट्रिक अल्सर होता है।


हाल के अध्ययनों से पता चला है कि मानसिक तनाव, चिंता और तंत्रिका तनाव के संपर्क में आने की वजह से भी पेट के अम्ल का स्त्राव बढ़ता है, जिसकी वजह से अल्सर होता है। (Levenstein, 1998)    

इसके अलावा, यह धूम्रपान, शराब के सेवन और अस्वस्थ खाने की आदतों की कारण भी होता है जैसे चाय, कॉफ़ी और मसालों का अत्यधिक सेवन। अल्सर की जटिलताओं से बचने के लिए हम आपको प्राकृतिक उत्पादों का प्रयोग करने की सलाह देते हैं जिसके बारे में हम आपको पहले ही बता चुके हैं। पेट के अल्सर को ठीक करने के लिए अल्लाह द्वारा प्रदान किये गए सबसे महत्वपूर्ण औषधीय सत्तों में से एक है शुद्ध जैतून के तेल में सौंफ के तेल का सत्त, और प्राकृतिक सेब के सिरके में सौंफ का जलीय सत्त।  

इसके बारे में पता चला है कि सौंफ में मौजूद प्रमुख सामग्री ऐनेथोल पेट की श्लेष्मा झिल्ली से श्लेम और श्लेष्मा परत के उत्पादन में वृद्धि करने वाली प्रभावशाली सामग्री है, यह पेट की संरक्षक परतों की मोटाई और सुरक्षा में वृद्धि करता है। इसके अलावा, सौंफ के सत्त में ऐनेथोल की मात्रा आमाशय के रस, और pH के आयतन में महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है, जो पेप्टिक अल्सर के मरीजों की काफी सहायता करता है। (Koriem, 2015)    

2007 में किये गए और जठरांत्र विज्ञान की वैश्विक पत्रिका में प्रकाशित प्रायोगिक अध्ययन में, चूहों के एक समूह में अल्सर उत्पन्न करने के उद्देश्य से उन्हें इंडोमेथासिन के अलावा विषाक्त रसायन दिया गया था, जहाँ इंडोमेथासिन सबसे प्रभावशाली प्रदाह-रोधी और दर्दनाशक दवाओं में से एक है, और NSAIDS की तुलना में जठरांत्रिय अल्सर उत्पन्न करने में ज्यादा प्रभावशाली है। बाद में, इन चूहों को सौंफ के जलीय सत्त की खुराक दी गयी। इसके अनुसार, चूहों के पेट का ऊतकीय रूप से परीक्षण किया गया। इससे पता चला कि सौंफ का जलीय सत्त इंडोमेथासिन और हानिकारक रसायनों के विरूद्ध पेट के श्लेष्मा झिल्ली के संक्षारण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सौंफ का सत्त संरक्षक कारकों के उत्पादन और प्रदाह-रोधी पदार्थों में वृद्धि करता है। इसके अलावा, यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है जो हानिकारक मुक्त कणों का प्रतिरोध करते हैं, ये मुक्त कण पेट की झिल्ली को नुकसान पहुँचाते हैं और इस प्रकार यह पेट की श्लेष्मा झिल्ली की क्षति कम करता है। (Al Mofleh et.al., 2007) 

चूँकि, हम सहक्रिया के तथ्य की वजह से अपनी संतुलित पौष्टिकता प्रणाली में भरोसा करते हैं, अर्थात, एकल-पदार्थ उपचार पर्याप्त नहीं होता है, जिसे पवित्र कुरान में पाया जा सकता है, जहाँ खाद्य और पेय पदार्थों से संबंधित सभी पाठ और आयतों को बहुवचन और सहक्रिया के रूप में उल्लेखित किया गया है। हमारे जीर्ण रोगों की क्रियाविधि विविध होती है, इसलिए बीमारियों के तंत्रों पर वार करने वाले संयोजक, आहार और क्रियाविधियां भी अलग-अलग होने चाहिए। इसलिए, हम देखते हैं कि पवित्र कुरान अलग-अलग आहारों के बारे में नहीं बताता, बल्कि उन्हें एक समूह के रूप में बताता है, और यह चिकित्सीय सहकारिता के सिद्धांत के अनुकूल है।

कुरान के सहकारिता के सिद्धांत के प्रयोग से प्राप्त विशेषज्ञता और अनुभवों के आधार पर, हम आपको शुद्ध जैतून के तेल में सौंफ का सत्त प्रयोग करने की सलाह देते हैं। यह सिद्ध किया गया है कि जैतून के तेल में पेट के अल्सर से राहत देने की क्षमता होती है, यह रक्त वाहिकाओं और पेट की परत में वसायुक्त जमावों से बचाने के लिए काम करता है। ऐसा माना जाता है कि इन जमावों की वजह से पेट का अल्सर विकसित होता है (Billings, 2013) 

हम आपको प्राकृतिक सेब के सिरके में सौफ का जलीय सत्त प्रयोग करने की भी सलाह देते हैं, क्योंकि यह सिद्ध किया गया है कि प्राकृतिक सेब के सिरके की कम सांद्रता अल्सर के विरुद्ध पाचन प्रणाली के लड़ने की क्षमता बढ़ाती है। (McGrath, 2015) 

कई पाठक सोच सकते हैं कि अम्ल के स्वाद वाला सिरका पेट या ग्रहणी के अल्सर के लिए कैसे प्रयोग किया जा सकता है। कई अध्ययनों के आधार पर, हम आपको आश्वासन देते हैं कि प्राकृतिक सेब का सिरका पाचन तंत्र के लिए सबसे अनुकूल प्राकृतिक उत्पादों में से एक है। यह पेट का अल्सर ठीक करने में और हानिकारक कीटाणुओं से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो पेट या ग्रहणी में प्रवेश कर सकते हैं, साथ ही यह अल्सर के सभी कारकों से भी लड़ता है।


अल्लाह सफलता के नियंत्रक हैं  


जमिल अल क़ुद्सी

एमडी-एमएससी सीएएम-डुप एफएम 


Al Mofleh, I. A., Alhaider, A. A., Mossa, J. S., Al-Soohaibani, M. O. & Rafatullah, S. 2007. Aqueous suspension of anise “pimpinella anisum” protects rats against chemically induced gastric ulcers. World journal of gastroenterology: WJG, 13, 1112.


Billings, S. 2013. The big book of home remedies, LULU Press.


Griffin, M. R., Piper, J. M., Daugherty, J. R., Snowden, M. & Ray, W. A. 1991. Nonsteroidal anti-inflammatory drug use and increased risk for peptic ulcer disease in elderly persons. Annals of internal medicine, 114, 257-263.


Kong, F. & Singh, R. 2008. Disintegration of solid foods in human stomach. Journal of food science, 73.


Koriem, K. M. M. 2015. Approach to pharmacological and clinical applications of anisi aetheroleum. Asian Pacific journal of tropical biomedicine, 5, 60-67.


Levenstein, S. 1998. Stress and peptic ulcer: Life beyond helicobacter. BMJ: British Medical Journal, 316, 538.


Mcgrath, S. 2015. Apple cider vinegar for health and beauty: Recipes for weight loss, clear skin, superior health, and much moreñthe natural way, Skyhorse Publishing.


Van Zanten, S. V. & Sherman, P. M. 1994. Helicobacter pylori infection as a cause of gastritis, duodenal ulcer, gastric cancer and nonulcer dyspepsia: A systematic overview. CMAJ: Canadian Medical Association Journal, 150, 177.




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