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जैतून के तेल और प्राकृतिक सेब के सिरके दोनों में संरक्षित गेहूं की घास का सत्त मधुमेह का स्तर नियंत्रित करने में सहायता करता है।

जैतून के तेल और प्राकृतिक सेब के सिरके दोनों में संरक्षित गेहूं की घास का सत्त मधुमेह का स्तर नियंत्रित करने में सहायता करता है।



क्या खाने से पहले या बाद में शर्करा की अनियमित मात्राओं की वजह से शर्करा का मापन आपके लिए चिंता का विषय बन गया है? क्या बेहतर शर्करा स्तर पाने के लिए आपके चिकित्सक ने दवाओं की खुराक और समय में परिवर्तन किया था, लेकिन यह व्यर्थ साबित हुआ? क्या नींद के दौरान अल्पशर्करारक्तता के दौरे पड़ने की वजह से आपको सोने में डर लगता है?    


जैतून के तेल और प्राकृतिक सेब के सिरके दोनों में संरक्षित गेहूं की घास का सत्त मधुमेह का स्तर नियंत्रित करने में सहायता करता है। सामान्य तौर पर, संतुलित पोषण प्रणाली में लक्ष्य पर वार करने का और रोग का सही उपचार करने का उद्देश्य रखा जाता हैं। इसके लिए इस रोग की क्रियाविधियों और कारकों के बारे में अच्छी तरह से जानना बहुत आवश्यक होता है। इसलिए, हमारे लिए यह जानना जरुरी है कि मानव शरीर रक्त में शर्करा कैसे समायोजित करता है और इसमें कितने प्रकार से शर्करा मौजूद होते हैं? शर्करा का स्त्रोत क्या है?  


आमतौर पर, जब आप पॉलीसैकेराइड या बहुशर्करा या मोनोसैकेराइड और डाइसैकेराइड के रूप में कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं तो  ग्लूकोस मिलता है, चावल या रोटी या नूडल्स में पॉलीसैकेराइड होता है, और टेबल शुगर, जैम या फलों आदि में मोनोसैकेराइड और डाइसैकेराइड पाया जाता है। दोनों स्थितियों में चाहे खाद्य पदार्थों में पॉलीसैकेराइड हो जो ग्लूकोस, फ्रक्टोस, गैलक्टोस जैसे मोनोसैकेराइड से बना होता है, या खाद्य पदार्थों में  मोनोसैकेराइड और डाइसैकेराइड हो, सभी के लिए मुंह से शुरू होने वाली पाचन प्रणाली जलीय संलयन प्रतिक्रियाओं के माध्यम से खाद्य पदार्थ संसाधित करती है।   


इन प्रतिक्रियाओं में शर्करा-हाइड्रोलाइज़िंग एंजाइम का स्त्राव शामिल होता है, जैसे मौखिक और अग्नाशय संबंधी एमिलिस, माल्टेज, लैक्टेज और अन्य, जो बाद में आंत के अंदर खाद्य के शर्करा को एक अणु वाले एकल शर्करा में परिवर्तित करता है। इनमें से ज्यादातर परिवर्तित शर्करा में ग्लूकोस होता है, जिसे ऊर्जा का पहला स्त्रोत माना जाता है और यह रक्त के माध्यम से शरीर के सभी अंगों और ऊतकों तक पहुँचता है, विशेष रूप से दिमाग तक। इसे इंसुलिन की उपस्थिति में कोशिकाओं में प्रवेश करने की क्षमता से जाना जाता है। पाचन और कार्बोहाइड्रेट के पाचन और अवशोषण के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले अन्य मोनोसैकेराइड में से एक फ्रक्टोस भी होता है, जिसे कोशिकाओं में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है, और इसे यकृत में ग्लूकोस में परिवर्तित किया जा सकता है। मानव शरीर में फाइबर के रूप में कार्बोहाइड्रेट की कुछ जटिल संरचनाएं होती हैं जो अपचनीय होती हैं जैसे सेल्यूलोस, लेकिन पशु इन्हें पचा सकते हैं, क्योंकि उनमें सेल्यूलोस फाइबर को पचाने के लिए विशेष एंजाइम मौजूद होते हैं।      

 

चूँकि, ये विशेष एंजाइम मानव शरीर में उपस्थित नहीं होते हैं इसलिए सेल्यूलोस फाइबर आंत में रह जाता है और मल त्याग की क्रिया को बेहतर बनाने में सहायता करता है और कई अन्य लाभों के अलावा कब्ज की रोकथाम करता है।  

तो मधुमेह के रोगियों के साथ क्या होता है? ताले और कुंजी के मॉडल के अनुसार सामान्य तौर पर इंसुलिन इन कोशिकाओं की सतह पर इंसुलिन के अभिग्राहकों को बांधकर कोशिकाओं में ग्लूकोस के प्रवेश को आसान बनाता है। यदि इंसुलिन अपर्याप्त या पूरी तरह से अनुपस्थित होता है या यदि अभिग्राहक निष्प्रभावी (इंसुलिन में इंसुलिन-अभिग्राहक का प्रतिरोध)  होते हैं तो ग्लूकोस कोशिकाओं या ऊतकों में प्रवेश नहीं कर पाता है। आमतौर पर, यह ज्यादातर उन लोगों में होता है जो मोटापे या मेटाबॉलिक सिंड्रोम से ग्रस्त होते हैं। इन सभी मामलों में, ग्लूकोस कोशिकाओं में बहुत कम प्रवेश करता है, और ज्यादातर रक्त में उपस्थित रहता है, जिसकी वजह से सामान्य से उच्च रक्त स्तर हो जाता है, और इसे मधुमेह के रूप में जानते हैं। रक्त में शर्करा की सामान्य से अधिक मात्रा की वजह से, रक्त में शर्करा का स्तर गुर्दे की सीमा से ज्यादा हो जायेगा, जिसकी वजह से मूत्र के रास्ते ग्लूकोस बाहर निकलने लगता है। परिणामस्वरूप, इसकी वजह से बार-बार मूत्र त्याग होता है और इसके बाद प्यास लगती हैं और आप बार-बार पानी पीते हैं। समय के साथ, शर्करा का जमाव सोर्बिटॉल और फ्रक्टोस जैसे विषाक्त पदार्थों में बदल जायेगा। शारीरिक अंगों में इन पदार्थों के जमाव से, जैसे नेत्रों या गुर्दे के रक्त केशिकाओं में जमाव से, रेटिना अलग होने और गुर्दा खराब होने जैसी समस्या उत्पन्न हो जाती है जिसे मूत्र के साथ प्रोटीन के स्त्राव से जोड़ा जाता है। इसके अलावा, स्नायु में शर्करा का जमाव, मूत्र और यौन गतिविधियों को प्रभावित करता है और इसकी वजह से शारीरिक और आंत संबंधी तंत्रिका विकृति होती है। इसके अतिरिक्त, प्रमुख धमनियों में पदार्थों के संचय से धमनी काठिन्य हो जाता है। इसलिए, मधुमेह धमनी काठिन्य का प्रमुख कारक होता है।(2010) 

हम यह पुष्टि करते हैं कि प्राकृतिक जैतून के तेल में गेहूं की घास के तैलीय सत्त और प्राकृतिक सेब के सिरके में गेहूं की घास के जलीय सत्त के माध्यम से मधुमेह के मरीजों में रक्त के शर्करा स्तर को सामान्य स्तर पर लाना संभव है। मधुमेह नियंत्रित करने के लिए और शर्करा को सामान्य स्तर पर रखने के लिए चूहों पर किये गए अध्ययन से पता चलता है कि गेहूं का सत्त अग्न्याशय में लैंगरहैंस-आइलैंड कोशिकाओं की बीटा कोशिकाओं से इंसुलिन का उत्पादन बढ़ाकर रक्त में शर्करा का स्तर कम करता है और इसके परिणामस्वरूप कोशिकाओं में ग्लूकोस के अणुओं के प्रवेश करने की दर में वृद्धि होती है। इसके अलावा, यह पाचन मार्ग से ग्लूकोस का अवशोषण भी कम करता है अर्थात, यह खाद्य पदार्थों की प्रकृति को निम्न-शर्करा सूचकांक में बदल देता है। केवल यही नहीं, गेहूं का सत्त यकृत और मांसपेशियों में ग्लाइकोजन के रूप में ग्लूकोस के परिवर्तन और संग्रहण की दर को बढ़ाकर रक्त में ग्लूकोस की मात्रा भी कम करता है। ग्लाइकोजन जटिल कार्बोहाइड्रेट का एक रूप है जिसे पशु स्टार्च के रूप में जाना जाता है, ग्लाइकोजन की उपलब्धता निम्न ग्लूकोस स्तरों से संबंधित आपातकालीन परिस्थितियों से बचने में प्रभावी रूप से योगदान करती है, क्योंकि रक्त में शर्करा ग्लूकोस की मात्रा कम होने पर शरीर को तेजी से प्रदान करने के लिए ग्लूकोस तेज स्त्रोत होता है।(Shaikh et.al., 2011) 

चूँकि, हम सहक्रिया के तथ्य की वजह से अपनी संतुलित पौष्टिकता प्रणाली में भरोसा करते हैं, अर्थात, एकल-पदार्थ उपचार पर्याप्त नहीं होता है, जिसे पवित्र कुरान में पाया जा सकता है, जहाँ खाद्य और पेय पदार्थों से संबंधित सभी पाठ और आयतों को बहुवचन और सहक्रिया के रूप में उल्लेखित किया गया है। हमारे जीर्ण रोगों की क्रियाविधि विविध होती है, इसलिए बीमारियों के तंत्रों पर वार करने वाले संयोजक, आहार और क्रियाविधियां भी अलग-अलग होने चाहिए। इसलिए, हम देखते हैं कि पवित्र कुरान अलग-अलग आहारों के बारे में नहीं बताता, बल्कि उन्हें एक समूह के रूप में बताता है, और यह चिकित्सीय सहकारिता के सिद्धांत के अनुकूल है। इसलिए, हमें जैतून के तेल और सेब के सिरके दोनों में औषधीय सत्त क्यों मिलाना चाहिए? इसके पीछे कुरान के क्या रहस्य हैं? 

कुरान के सहकारिता के सिद्धांत के प्रयोग से प्राप्त विशेषज्ञता और अनुभवों के आधार पर, हम आपको शुद्ध जैतून के तेल में गेहूं की घास का सत्त प्रयोग करने की सलाह देते हैं क्योंकि 2011 में खाद्य जैव रसायन की पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने यह सिद्ध किया है कि जैतून के तेल में मौजूद फेनोलिक यौगिक α-ग्लूकोसिडेज और α-एमिलेस एंजाइम को बाधित करके शरीर में शर्करा के स्तरों को कम करता है। इन दोनों एंजाइम कि वजह से कार्बोहाइड्रेट का पाचन होता है और यह मोनोसैकेराइड में परिवर्तित होता है, और जैतून के तेल में मौजूद फेनोलिक यौगिकों द्वारा बाधित होने के बाद, रक्त में कम मोनोसैकेराइड स्त्रावित होगा। यह बताना उपयोगी है कि आंत तब तक किसी प्रकार के कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन या वसा को अवशोषित नहीं करता है, जब तक कि ये पहले से विखंडित नहीं होते हैं। इसलिए, प्राकृतिक शुद्ध जैतून का तेल जिसे हम अपने उत्पादों में गेहूं के घास के संरक्षक के रूप में प्रयोग करते हैं वो शर्करा का स्तर कम करता है जो खाने के पाचन से उत्पन्न होता है और अवशोषित ग्लूकोस को कम करके रक्त में ग्लूकोस के अणुओं में कमी करता है। (Loizzo et.al., 2011)  

हम आपको हमारा प्राकृतिक सेब के सिरके में गेहूं के जलीय सत्त वाला उत्पाद प्रयोग करने की सलाह देते हैं। क्योंकि यह सिद्ध किया गया है कि सत्त के संरक्षक में क्वेरसेटिन होता है, जो सेब के मुख्य घटकों में से एक है(Boyer et.al., 2004)


क्वेरसेटिन α-ग्लूकोसिडेज और α-एमिलेस एंजाइम को बाधित करता है जो शरीर में कार्बोहाइड्रेट को पचाने के लिए और रक्त में ग्लूकोस के अणुओं के उत्पादन के लिए उत्तरदायी होता है। इसकी वजह से, रक्त में ग्लूकोस और अन्य मोनोसैकेराइड का अनुपात कम होता है।(Kumar et.al., 2013)  


जमिल अल क़ुद्सी

एमडी-एमएससी सीएएम-डुप एफएम 



2010. Diagnosis and classification of diabetes mellitus. Diabetes Care, 33, S62-S69.


Boyer, J. & Liu, R. H. 2004. Apple phytochemicals and their health benefits. Nutrition journal, 3, 5.


Kumar, S., Kumar, V. & Prakash, O. 2013. Enzymes inhibition and antidiabetic effect of isolated constituents from dillenia indica. BioMed research international, 2013.


Loizzo, M., Lecce, G., Boselli, E., Menichini, F. & Frega, N. 2011. Inhibitory activity of phenolic compounds from extra virgin olive oils on the enzymes involved in diabetes, obesity and hypertension. Journal of Food Biochemistry, 35, 381-399.


Shaikh, M., Quazi, M. & Nandedkar, R. 2011. Hypoglycemic effect of wheatgrass juice in alloxan induced diabetic rats. Pharma Tutor.




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