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गठिया आपकी गति में बाधा उत्पन्न करता है

गठिया आपकी गति में बाधा उत्पन्न करता है


क्या आपको चलने में कठिनाई होती है? क्या गठिया के दर्द की वजह से आपको रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होती है? क्या आपको बैठने या चलने में कष्ट होता है? क्या आपको अत्यधिक दर्द का अनुभव होता है, और इसे कम करने के लिए आप कुछ नहीं कर सकते हैं? क्या बहुत अधिक गठिया-रोधी दवाओं के सेवन की वजह से आपकी पाचन प्रणाली खराब हो गयी है? यदि आपको हाल में दर्द हुआ है, या वर्षों से दर्द हो रहा है, और अभी तक आराम नहीं मिला है तो हम आपको शुद्ध जैतून के तेल या सेब के सिरके में कलौंजी का सत्त प्रयोग करने का सुझाव देते हैं जो गठिया में जोड़ों के दर्द से आराम देने में और कष्ट दूर करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। चलिए सबसे पहले जानें कि गठिया क्या है और यह किन कारणों से होता है?

गठिया, एक प्रदाह है जो सभी प्रकार के जोड़ों, जैसे घुटने, कोहनी, कलाई के जोड़, पैर के जोड़, पैर की उंगलियों, कूल्हे के जोड़, जबड़े के जोड़ और रीढ़ और मेरुदंड के हिस्से में हो सकता है। गठिया के 100 से अधिक ज्ञात प्रकार हैं, दो सबसे प्रमुख गठिया के प्रकार हैं: (Nelson) 

ऑस्टियोआर्थराइटिस या अस्थिसंधिशोथ, जो यांत्रिक तनाव की वजह से होता है, और जोड़ की उपास्थि और अस्थि-बंधन में समस्या की वजह से हो सकता है। जोड़ की उपास्थि टूटने की वजह से एक ऐसी स्थिति आ जाती हैं, जिसमें हड्डियां खिसक जाती हैं और तेज दर्द होता है। इससे गति प्रभावित होती है, और जोड़ों की गतिविधि में बाधा आती है। उपास्थि का अलगाव वर्षों में हो सकता है, और किसी चोट या दुर्घटना के तुरंत बाद हो सकता है। (Dieppe, 2005) 

रुमेटी गठिया दूसरा सबसे प्रमुख गठिया का प्रकार है, और इस प्रकार को श्लेष झिल्ली पर प्रतिरक्षा प्रणाली के आक्रमण के रूप में जाना जाता है, जिससे प्रदाह उत्पन्न होता है, जिसे जोड़ों में सूजन, लालिमा, दर्द और जकड़न के रूप में दर्शाया जाता है। यह बीमारी उपास्थि खराब कर सकती है, और जोड़ों को विकृत बना सकती है। रुमेटी एक स्व-प्रतिरक्षी रोग है। (Rindfleisch et.al., 2005) 


गठिया और जोड़ों का दर्द ठीक करने के लिए स्टेरॉयड-रहित प्रदाहरोधी NSAID सबसे प्रमुख दवा है। लेकिन, इसके पेट और किडनी पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं। (Suleyman et.al., 2007) 

लेकिन पवित्र कुरान के पोषण विज्ञान के नियमों के अनुसार, "बुराई को दूर करना लाभ लाने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है", और हिप्पोक्रेटिक के सिद्धांत के अनुसार, "नुकसान ना पहुँचायें" के माध्यम से हम हमेशा ज्यादा लाभकारी, और कम नुकसानदायक उपचार चाहते हैं।  

इसलिए, हम आपको जोड़ों का दर्द और जकड़न कम करने के लिए शुद्ध जैतून के तेल और सेब के सिरके में कलौंजी का सत्त प्रयोग करने की सलाह देते हैं। 

पैगम्बर मुहम्मद ने मृत्यु के अलावा किसी भी प्रकार की बीमारी के लिए कलौंजी का प्रयोग करने की सलाह दी है। अल बुखारी के अनुसार, "कलौंजी लें, इसमें मृत्यु को छोड़कर सभी बीमारियों के लिए उपचार है।"  

यह कलौंजी बिल्कुल छोटी होती है लेकिन यह अद्भुत है और इसके कई लाभ हैं। उन अल्लाह का बहुत शुक्रिया जिन्होंने इस छोटे दाने में सभी रोगों का उपचार बनाया और धरती का निर्माण किया। कलौंजी मोटी सौंफ या सौंफ की प्रजाति से संबंधित है, इसे मोटी डंठल, शाखादार पत्तियों और नीले से धूमिल रंग की एकाधिक पत्तियों वाले फूल से दर्शाया जाता है। 

इसमें दाँतदार बीज होते हैं। इसके अलावा, इस पौधे के फल में सफ़ेद बीजों वाले कैप्सूल होते हैं, इसके बाद वायु के संपर्क में आने पर इसके बीज काले रंग के हो जाते हैं इस फल को कलौंजी के रूप में जाना जाता है। इसकी जाति का नाम नाइजेला सैटाइवा है और अंग्रेजी में इसे ब्लैक क्यूमिन के नाम से जाना जाता है, लेकिन सामान्य तौर पर मुस्लिम इसे मुबारक बीज और मिस्र के लोग इसे काला जीरा कहते हैं, फ़ारसी इसे शोनीज़ सिया दाना कहते हैं, साथ ही भारतीय इसे कलौंजी के रूप में जानते हैं और इसे ब्लैक करावे के रूप में भी जाना जाता है।

शुद्ध जैतून के तेल में कलौंजी का तैलीय सत्त और सेब के सिरके में कलौंजी का जलीय सत्त कई बीमारियों में सक्रिय भूमिका निभाता है, साथ ही इसमें पीठ और सभी प्रकार के गठिया से उत्पन्न होने वाले दर्द में राहत देने की भी क्षमता होती है।(Mahdy et.al.) 

आगा खान विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सितंबर 2003 में फायटोएथेर पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित किया था, उनका एक प्रश्न था: "रुमेटी गठिया से पीड़ित मरीजों के लिए जोड़ों के दर्द में राहत के लिए कलौंजी की क्या भूमिका है?" इस अध्ययन में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन रोकने की कलौंजी की क्षमता से जोड़ों का दर्द कम करने में और इसे समाप्त करने में कलौंजी की क्रियाविधि प्रदर्शित की गयी थी, जो गठिया उत्पन्न करने वाला श्वेत रक्त कणिकाओं का उत्पाद होता है। यदि यह श्वेत रक्त कणिका रक्त से प्रवाहित होकर जोड़ के ऊतकों में चली जाती है तो यह बृहतभक्षककोशिका में विकसित हो जाता है। नाइट्रिक ऑक्साइड गठिया सहित प्रदाह की प्रक्रिया उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए, इन मध्यस्थों के लिए कलौंजी के सत्त के निरोधात्मक प्रभाव की वजह से जोड़ों के दर्द में काफी आराम और राहत मिलती है।(Mahmood et.al., 2003)

फैज़ल विश्वविद्यालय के डॉ. अल ग़ामिदी ने 2001 में एथनोफार्माकॉलोजी पत्रिका में यह प्रदर्शित करने के लिए एक अध्ययन प्रकाशित किया था कि जोड़ों के दर्द के लिए कलौंजी में प्रदाह-रोधी और दर्दनाशक गुण होते हैं।  (Al-Ghamdi, 2001) 

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कलौंजी ने गतिविधियों के कई रूप प्रदर्शित किये थे, जिनमें से एक नाइट्रिक ऑक्साइड को रोकने की क्रियाविधि भी थी, अन्य अध्ययनों में दर्शाया गया कि यह विभिन्न क्रियाविधियों में काम करता है। 

2006 में फायटोथेरेपी की पत्रिका में प्रकाशित चूहों पर किये गए वैज्ञानिक प्रयोगों में, एक अध्ययन ने दर्शाया कि कलौंजी में वाष्पशील तेल से 27.8- 57% के बीच की दर में थीमोक्विनोन अम्ल शामिल होता है। यह अम्ल सक्रिय प्रदाह-रोधी यौगिक के रूप में काम करता है और जोड़ों को सूजन और दर्द से बचाने में मुख्य भूमिका निभाता है। (Tekeoglu et.al., 2007)

चूँकि, हम सहक्रिया के तथ्य की वजह से अपनी संतुलित पौष्टिकता प्रणाली में भरोसा करते हैं, अर्थात, एकल-पदार्थ उपचार पर्याप्त नहीं होता है, जिसे पवित्र कुरान में पाया जा सकता है, जहाँ खाद्य और पेय पदार्थों से संबंधित सभी पाठ और आयतों को बहुवचन और सहक्रिया के रूप में उल्लेखित किया गया है। हमारे जीर्ण रोगों की क्रियाविधि विविध होती है, इसलिए बीमारियों के तंत्रों पर वार करने वाले संयोजक, आहार और क्रियाविधियां भी अलग-अलग होने चाहिए। इसलिए, हम देखते हैं कि पवित्र कुरान अलग-अलग आहारों के बारे में नहीं बताता, बल्कि उन्हें एक समूह के रूप में बताता है, और यह चिकित्सीय सहकारिता के सिद्धांत के अनुकूल है। 

कुरान के सहकारिता के सिद्धांत के प्रयोग से प्राप्त विशेषज्ञता और अनुभवों के आधार पर, हम आपको शुद्ध जैतून के तेल और सेब के सिरके दोनों में कलौंजी का सत्त प्रयोग करने की सलाह देते हैं क्योंकि कलौंजी के संरक्षक जैतून के तेल में प्रदाह-रोधी प्रभाव होता है और यह रुमेटी और गठिया का दर्द कम करने में सहायता करता है। यह कलौंजी के सत्त और शुद्ध जैतून के तेल के लिए सहक्रिया के सिद्धांत के अनुकूल है जो जोड़ों के दर्द में बेहतर नियंत्रण और प्रभाव की क्रियाविधियां प्रदान करता है, और इस रोग से ग्रस्त मरीजों का दर्द कम करता है। 

शोधकर्ताओं के एक समूह ने चूहों पर वैज्ञानिक अनुसंधानात्मक अध्ययन किया और उन्होंने 2011 में औषधि विज्ञान और प्रयोगात्मक चिकित्सा विज्ञान की पत्रिका में अपना अध्ययन प्रकाशित किया, इस अध्ययन में उन्होंने आधुनिक चिकित्सा में गठिया के उपचार के लिए विकसित किये गए आधुनिक प्रदाह-रोधी दवाओं की तुलना जैतून के तेल के महत्वपूर्ण प्रभाव से की थी। आधुनिक प्रदाह-रोधी दवाओं के विपरीत, जैतून के तेल में कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है, वहीं आधुनिक दवाओं की वजह से पेट में अल्सर, प्रदाह और रक्तस्त्राव हो सकता है, साथ ही इसका गुर्दों पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है, जैसे गुर्दे खराब होना। इस अध्ययन में सिद्ध किया गया कि जैतून के तेल में मौजूद ओल्यूरोपिन, सायक्लोऑक्सीजिनेस को रोकने में सक्षम है, जो प्रोस्टानोइड नामक महत्वपूर्ण जैविक मध्यस्थ निर्मित करता है। इनमें प्रोस्टाग्लैंडीन, प्रोस्टासायक्लीन, और थ्रोमोबाक्सेन शामिल हैं। सायक्लोऑक्सीजिनेस को रोकने पर, प्रोस्टाग्लैंडीन और थ्रोमोबाक्सेन का संश्लेषण भी रुक जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रदाह कम होता है, बुखार समाप्त होता है और घनास्त्रता बाधित होती है। (Williams et.al., 1996) 

इस प्रकार, प्रदाहक रसायन प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करने वाला प्रमुख प्रेरक बल समाप्त हो जायेगा। एंजाइम के नियम के बारे में जानने के लिए और यह जानने के लिए कि वे उस प्रतिक्रिया को सेकंड में कैसे प्रेरित करते हैं, जिसके लिए लाखों वर्षों का समय लगता है, 

यह जानना उपयोगी है कि एस्पिरिन और आइबूप्रोफेन जैसी NSAID स्टेरॉइडल-रहित प्रदाह-रोधी दवाएं सायक्लोऑक्सीजिनेस COX में बाधा उत्पन्न करके उसी क्रियाविधि से काम करती है जिस प्रकार जैतून का तेल काम करता है।  (Brater, 1999)

NSAID की तुलना में जैतून के तेल का सबसे प्रमुख अंतर यह है कि बहुगुणी और बहु-लाभकारी होने के अतिरिक्त इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होता है। यह तथ्य हमें एक आयत की याद दिलाता है: रचना करने वाला रचना ना करने वाले की तरह है, क्या आपको नहीं लगता) अन-नहल 17 

दिलचस्प बात यह है कि यह विषय तब उठा जब एक वैज्ञानिक ने देखा कि आइबूप्रोफेन दवा लेने पर गले में दर्द उत्पन्न होता है, साथ ही शुद्ध जैतून के तेल से भी यही होता है। इसने इस पहलु पर वैज्ञानिकों को और अधिक शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया। (Impellizzeri et.al., 2011) 

हम गठिया के रोगियों को सेब के सिरके में कलौंजी का जलीय सत्त प्रयोग करने का सुझाव देते हैं क्योंकि अध्ययनों में सिरके के प्रदाह-रोधी गुणों को सिद्ध किया गया है 

2014 में दवा विकास और शोध की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन दर्शाता है कि कलौंजी के सत्त के लिए संरक्षक माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाने वाला सेब का सिरका गठिया के मरीजों के जोड़ों का दर्द और जकड़न कम करने में काफी प्रभावशाली है। यह क्वेरसेटिन की वजह से होता है, जो फायटोकेमिकल पॉलीफेनोल और फ्लैवोनॉइड है, जिसमें विशेष रूप से गठिया के विरुद्ध विशेष प्रदाह-रोधी प्रभाव होता है।(Ansari et.al., 2014)  

कलौंजी के जलीय सत्त और सेब के सिरके के सहक्रिया के सिद्धांत में प्रदाह-रोधी प्रभाव दिखाई देता है      


जमिल अल क़ुद्सी

एमडी-एमएससी सीएएम-डुप एफएम   

       


Al-Ghamdi, M. 2001. The anti-inflammatory, analgesic and antipyretic activity of nigella sativa. Journal of Ethnopharmacology, 76, 45-48.


Ansari, M. M. & Neha, H. a. K. 2014. Quercetin alleviate oxidative stress and inflammation through upregulation of antioxidant machinery and down-regulation of cox2 and nf-b expression in collagen induced rheumatoid arthritis. International Journal of Drug Development and Research.


Brater, D. C. 1999. Effects of nonsteroidal anti-inflammatory drugs on renal function: Focus on cyclooxygenase -2–selective inhibition. The American Journal of Medicine, 107, 65-70.


Dieppe, P. A. 2005. Relationship between symptoms and structural change in osteoarthritis: What are the important targets for therapy? The Journal of rheumatology, 32, 1147-1149.


Impellizzeri, D., Esposito, E., Mazzon, E., Paterniti, I., Di Paola, R., Morittu, V. M., Procopio, A., Britti, D. & Cuzzocrea, S. 2011. Oleuropein aglycone, an olive oil compound, ameliorates development of arthritis caused by injection of collagen type ii in mice. Journal of Pharmacology and Experimental Therapeutics, 339, 859-869.


Mahdy, A. & Gheita, T. Beneficial effects of nigella sativa seed oil as adjunct therapy in rheumatoid arthritis.


Mahmood, M. S., Gilani, A., Khwaja, A., Rashid, A. & Ashfaq, M. 2003. The in vitro effect of aqueous extract of nigella sativa seeds on nitric oxide production. Phytotherapy Research, 17, 921-924.


Nelson, Ashley. "Knuckle Cracking And Arthritis". Health Psychology. N.p., 2009.

 

Rindfleisch, J. A. & Muller, D. 2005. Diagnosis and management of rheumatoid arthritis. Am Fam Physician, 72, 1037-47.


Suleyman, H., Demircan, B. & Karagoz, Y. 2007. Anti-inflammatory and side effects of cyclooxygenase inhibitors. Pharmacol Rep, 59, 247-258.


Tekeoglu, I., Dogan, A., Ediz, L., Budancamanak, M. & Demirel, A. 2007. Effects of thymoquinone (volatile oil of black cumin) on rheumatoid arthritis in rat models. Phytotherapy Research, 21, 895-897.


Williams, C. S. & Dubois, R. N. 1996. Prostaglandin endoperoxide synthase: Why two isoforms? American Journal of Physiology-Gastrointestinal and Liver Physiology, 270, G393-G400.




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